Jana Nayagan Movie Review: लोकतंत्र बचाने निकले थलपति विजय, एक्शन और राजनीति का जबरदस्त कॉम्बिनेशन है ‘जन नायकन’ – Jana Nayagan movie review in hindi CM thalapathy vijay bobby deol kaisi hai jana nayagan tmovg


‘ईट का जवाब पत्थर से देना पड़ता है, हर बात धरना देना या अनशन से पूरी नहीं होती…’ सिनेमाघर में गूंजता यह एक डायलॉग ही यह बताने के लिए काफी है कि पर्दे पर क्या माहौल होने वाला है. थलपति विजय की फिल्म ‘जन नायगन'(जन नेता) देखने जब दर्शक थियेटर पहुंच रहे हैं, तो पूरा हॉल किसी क्रिकेट स्टेडियम से कम नजर नहीं आ रहा. हर सीन पर सीटी, हर डायलॉग पर चीयरिंग और विजय के एंट्री सीन्स पर जश्न का माहौल है. 

राजनीति के मैदान में उतर चुके और अब ‘सीएम विजय’ के नाम से पहचाने जा रहे थलपति विजय के फैंस के लिए यह फिल्म किसी बहुत बड़े तोहफे से कम नहीं है. डायरेक्टर एच. विनोथ ने इसे विजय के फिल्मी करियर के एक शानदार और यादगार ट्रिब्यूट की तरह तराशा है.

एच. विनोद के डायरेक्शन में बनी ‘जन नेता’ दरअसल तेलुगु की सुपरहिट फिल्म ‘भगवंत केसरी’ से प्रेरित है. हालांकि, मेकर्स ने फिल्म की मूल आत्मा को बरकरार रखते हुए इसके ताने-बाने में बड़े बदलाव किए हैं. ‘जन नेता’ केवल एक साधारण एक्शन ड्रामा नहीं रह जाती, बल्कि इसे लोकतंत्र, आधुनिक युद्ध, और संस्थागत भ्रष्टाचार जैसे बेहद गंभीर विषयों के इर्द-गिर्द एक हाई-ऑक्टेन पॉलिटिकल एक्शन थ्रिलर के रूप में ढाला गया है.

क्या है फिल्म की मुख्य कहानी?
कहानी की शुरुआत थलपति वेत्री कोंडन उर्फ TVK (विजय) से होती है, जो एक पूर्व पुलिस अधिकारी हैं और फिलहाल जेल में बंद हैं. एक दिन जेलर नियमों को ताक पर रखकर उन्हें अपनी बीमार मां से मिलवाने ले जाता है, जिसकी सजा के तौर पर जेलर को सस्पेंड कर दिया जाता है. बाद में 15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर विजय की रिहाई हो जाती है. रिहा होने के बाद थलपति उस जेलर की बेटी विजी (ममिता बैजू) का ख्याल रखने का जिम्मा उठाते हैं. इसी बीच जेलर की एक एक्सीडेंट में मौत हो जाती है.

दूसरी तरफ कहानी में एंट्री होती है जॉन हेमलर (बॉबी देओल) की, जो एक बेहद खूंखार और निर्दयी क्रिमिनल है. साउथ अफ्रीका में तबाही मचाने के बाद वह भारत में भी आतंकवाद फैलाने की फिराक में है. कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब विजी का अपहरण हो जाता है और उसे बचाते वक्त थलपति का सामना जॉन से होता है. जॉन का भी एक पास्ट है- वह कभी डिप्टी कमिश्नर अमरीश पुजारी हुआ करता था. उसका अतीत क्या था और वह इस मोड़ तक कैसे पहुंचा, यह सब दूसरे हाफ में धीरे-धीरे परत-दर-परत खुलता है.

पर्दे पर थलपति विजय का जादुई जलवा
इस पूरी फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष थलपति विजय की अपनी स्क्रीन प्रेजेंस है. उनका चलने का अंदाज, डांस मूव्स, स्लो-मोशन एंट्री और भारी-भरकम डायलॉग डिलीवरी- हर एक फ्रेम को डायरेक्टर ने बहुत ही बारीकी से सजाया है. ऐसा लगता है कि विजय ने अपनी इस आखिरी फिल्म को पूरी शिद्दत से जिया है. फिल्म में शुरू से लेकर अंत तक जबरदस्त फाइट सीन्स हैं, जो दर्शकों में रोमांच बनाए रखते हैं. रही-सही कसर अनिरुद्ध रविचंदर का धमाकेदार बैकग्राउंड म्यूजिक पूरी कर देता है, जो विलेन की एंट्री से लेकर विजय के एक्शन सीक्वेंस तक में जान फूंक देता है.

स्टारकास्ट की एक्टिंग
परफॉर्मेंस के मामले में पूरी फिल्म पर विजय का एकछत्र राज है. एक्शन और डांस के अलावा बेटी के प्रति उनका इमोशनल रूप उन्हें एक गंभीर एक्टर साबित करता है. पूजा हेगड़े ने एक पत्रकार की भूमिका में अच्छा काम किया है; विजय के साथ उनकी केमिस्ट्री काफी जमती है. ममिता बैजू ने अपने किरदार को बहुत ही संजीदगी से निभाया है और उनके हिस्से आए एक्शन सीन्स भी काफी प्रभावशाली हैं.

दूसरी ओर, खूंखार विलेन बने बॉबी देओल की एंट्री फिल्म के सबसे खतरनाक एक्शन सीन्स के साथ होती है. उनकी स्क्रीन प्रेजेंस और BGM का मेल वाकई रोंगटे खड़े करने वाला है. इसके अलावा प्रकाश राज, गौतम वासुदेव मेनन, प्रियामणि और नासर जैसे दिग्गज कलाकारों ने अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया है. प्रकाश राज को स्क्रीन पर अच्छा-खासा समय मिला है, जिसका उन्होंने बेहतरीन इस्तेमाल किया है.

डायरेक्शन, तकनीक और कमजोर कड़ियां
अगर फिल्म की कमजोरी की बात करें तो कहीं-कहीं इसका निर्देशन थोड़ा बिखरा हुआ लगता है, लेकिन डायरेक्टर एच. विनोथ का पूरा फोकस विजय के स्टारडम और उनके फैंस को खुश करने पर था और इस मकसद में वे पूरी तरह से सफल रहे हैं. उन्होंने ओरिजिनल कहानी में ऐसे बदलाव किए हैं जो थलपति के फैंस को सीधे कनेक्ट करते हैं.

तकनीकी पहलू की बात करें तो सत्यन सूर्यन की सिनेमैटोग्राफी आउटडोर और रियल एक्शन सीन्स में बहुत शानदार नजर आती है. हालांकि, जहां-जहां CGI और VFX का इस्तेमाल हुआ है, वहां काम थोड़ा कच्चा और अटपटा लगता है. फिल्म में AI का इस्तेमाल भी काफी कमजोर महसूस होता है, जो थोड़े बेहतर फिनिशिंग की मांग करता था.

राजनीति, संदेश और फैंस के लिए खास सरप्राइज
‘जन नेता’ में काफी सारा राजनीतिक कंटेंट भरा हुआ है, जो बिल्कुल सीधा और स्पष्ट है. फिल्म सत्ता के दुरुपयोग, लोकतंत्र को खत्म करने और राजनेताओं द्वारा अपने स्वार्थ के लिए जनता को आपस में लड़ाने की कड़वी सच्चाई को बड़ी बेबाकी से उजागर करती है. संविधान की कॉपी हाथ में लेकर विजय का जेल से बाहर आना अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक संदेश देता है.

इसके साथ ही, फिल्म बहुत ही सहज तरीके से महिला सशक्तिकरण, ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ जैसे संवेदनशील सामाजिक मुद्दों को भी छूकर निकलती है. इसमें आधुनिक युद्ध और बूथ कैप्चरिंग जैसी समस्याओं की झलक भी देखने को मिलती है. विजय के फैंस के लिए सबसे बड़ा सरप्राइज फिल्म में एटली, लोकेश कनगराज, नेल्सन दिलीप कुमार और अनिरुद्ध के कैमियो सीन्स हैं, जो विजय के फिल्मी सफर की विदाई पर मोहर लगाते हैं.

क्यों देखें यह फिल्म?
साउथ के सिनेमाघरों में तो इस वक्त विजय के नाम का तूफान आया हुआ है. लेकिन अगर यह फिल्म हिंदी पट्टी के दर्शकों तक सही ढंग से पहुंचती है, तो कई राजनीतिक घरानों को असहज कर सकती है. ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें विजय केवल तमिलनाडु की नहीं, बल्कि पूरे देश के लोकतंत्र को बचाने की बात करते हैं. अगर आप इसे देखने का प्लान बना रहे हैं, तो थोड़ा फुर्सत का समय निकालकर जाएं. फिल्म थोड़ी लंबी जरूर है, लेकिन अपने एक्शन, मैसेज और थलपति विजय के एक्टिंग के दम पर पूरी तरह से देखने लायक है.

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