कैंसर के हर मरीज का रिकॉर्ड रखना क्यों जरूरी हो गया है? इससे आम लोगों को क्या फायदा होगा – Supreme court orderscancer patient reporting know benefits for patients Tvisa


सुप्रीम कोर्ट ने देश के 19 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को कैंसर को अधिसूचित बीमारी’ (Notifiable Disease) की श्रेणी में रखने का आदेश जारी किया है. कोर्ट को बताया गया था कि देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से सिर्फ 17 ने ही कैंसर को नोटिफ़िएबल बीमारी की लिस्ट में शाामिल किया है. ऐसे में कोर्ट ने बचे हुए राज्यों को भी इस बीमारी के मरीजों का आधिकारिक रिकॉर्ड रखने के निर्देश दिए हैं. 

‘अधिसूचित बीमारी’ (Notifiable Disease) वह होती है जिसके मामलों की जानकारी अस्पतालों, डॉक्टरों और लैब के लिए सरकार या स्वास्थ्य अधिकारियों को देना कानूनन अनिवार्य होता है. भारत में डेंगू, मलेरिया, टीबी, एड्स और कई दूसरी बीमारियां नोटिफ़िएबल बीमारी की लिस्ट में आती है. इनके एक-एक केस के आंकड़ों की जानकारी सरकार तक जाती है. 

पूरे देश में कैंसर को अधिसूचित बीमारी की लिस्ट में शामिल करना क्यों है जरूरी

आईएमआर की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2023 में भारत में कैंसर के नए मामलों की संख्या 14,61,427 थी. इसके बाद से हर साल यह आंकड़ा बढ़ रहा है. कैंसर के हर मामले का रिकॉर्ड इसलिए जरूरी है ताकि इस बीमारी के मरीजों की कुल संख्या का सही- सही आंकड़ा सरकार तक पहुंच सके.

मान लीजिए किसी जिले में कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. इन मामलों की जानकारी अलग-अलग अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों में दर्ज की जा रही है और सरकार के पास जा भी रही है, वहीं, किसी दूसरे राज्य में भी कैंसर के केस तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन वहां यह बीमारी नोटिफ़िएबल नहीं है तो सरकार के लिए यह समझना मुश्किल होगा कि उस जिले में वास्तव में कितने कैंसर के मरीज हैं. लेकिन अगर इसका सटीक डाटा होगा तो यह पता लगाया जा सकता है कि किस इलाके में कैंसर के कितने मामले हैं, कौन से कैंसर ज्यादा पाए जा रहे हैं और किन इलाकों में मरीजों को जांच या इलाज की सुविधा कम मिल रही है. यही जानकारी आगे चलकर कैंसर से संबंधित स्वास्थ्य योजनाओं को बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है. सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि पूरे देश में कैंसर की रोकथाम और स्क्रीनिंग के लिए एक जैसी नीति लागू हो सकेगी. 

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भारत में पहले से है कैंसर रजिस्ट्री, फिर नई व्यवस्था की जरूरत क्यों?

भारत में कैंसर के आंकड़े जुटाने के लिए नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम (NCRP) पहले से काम कर रहा है. यह कैंसर के मामलों के पैटर्न और उनके रुझानों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. लेकिन इस समय इसके पास बहुत सीमित आंकड़े आते हैं. देश के हर हिस्से से एक समान और पूरा डेटा उपलब्ध नहीं है, ग्रामीण क्षेत्रों और कई राज्यों में कैंसर की वास्तविक स्थिति को लेकर जानकारी सीमित है. इसके अलावा, बड़ी संख्या में मरीज निजी अस्पतालों, डायग्नोस्टिक सेंटर और पैथोलॉजी लैब में जांच और इलाज कराते हैं. इन संस्थानों से मिलने वाली जानकारीव्यवस्थित रूप से राष्ट्रीय सिस्टम से नहीं जुड़ पाती है.

क्या कहती हैं इंडियन कैंसर सोसाइटी

इंडियन कैंसर सोसाइटी दिल्ली की चेयरपर्सन ज्योत्सना गोविल ने इस बारे में आजतक. इन को बताया है. वह कहती हैं कि  कैंसर के मामलों की अनिवार्य रिपोर्टिंग होनी चाहिए, ताकि इस बीमारी के मरीजों का सही आंकड़ा सरकार तक पहुंच सके. यह भी जरूरी है कि अलग-अलग राज्यों में कैंसर का डेटा एक जैसा होना चाहिए. अगर एक राज्य में कैंसर के मामले दर्ज करने का तरीका कुछ और हो और दूसरे राज्य में कुछ और, तो दोनों राज्यों के आंकड़ों की सही तुलना करना मुश्किल होगा.इसलिए एक समान राष्ट्रीय व्यवस्था की जरूरत है. इसमें यह स्पष्ट होना चाहिए कि कौन सा मामला दर्ज किया जाएगा, कौन इसकी जानकारी देगा, कितने समय में देगा और किस प्रारूप में देगा.

ज्योत्सना गोविल कहती हैं कि कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से अनिवार्य दिशा-निर्देशों के बारे में सवाल किया है जो बहुत महत्वपूर्ण है. नोटिफिकेशन का और लाभ होगा जब हमारे पास एक समान राष्ट्रीय व्यवस्था हो, जिससे अलग-अलग राज्यों से मिलने वाले आंकड़े आपस में मेल करवाए जा सकने वाले और इंटरऑपरेबल हों और नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम को मजबूत किया जा सके.

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इससे आम लोगों को क्या फायदा होगा?

सही आंकड़ों का फायदा सिर्फ सरकार को नहीं होगा. इसका सीधा असर मरीजों की स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी होगा. 
अगर किसी इलाके में किसी खास तरह के कैंसर के मामले ज्यादा सामने आ रहे हैं, तो वहां स्क्रीनिंग और शुरुआती जांच की सुविधाएं बढ़ाई जा सकती हैं. जरूरत के अनुसार अस्पताल, जांच केंद्र, कैंसर विशेषज्ञ और उपचार सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं.इसी तरह, जिन क्षेत्रों में मरीजों का बड़ी संख्या में देर से डायग्नोज हो रहा है, वहां शुरुआती पहचान और जागरूकता से जुड़े कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जा सकती है.
 

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