माया का सामंतवाद – akash anand removal bsp internal democracy mayawati leadership ntc apdy


उत्तर प्रदेश कि पूर्व मुख्यमंत्री और बीएसपी सुप्रीमो के नाम से जानी जाने वाली मायावती की राजनीति भारतीय लोकतंत्र की सबसे दिलचस्प राजनीतिक कहानियों में से एक है. जिस दलित समाज को सदियों तक सत्ता और सामाजिक व्यवस्था के हाशिये पर रखा गया, उसी समाज की एक बेटी ने सवर्ण वर्चस्व और सामंती व्यवस्था को चुनौती देते हुए उत्तर प्रदेश की सत्ता पर कब्जा किया. बहुजन समाज पार्टी ने दलितों को सिर्फ वोट बैंक मानने वाली राजनीति को चुनौती दी और मायावती उत्तर भारत में दलित राजनीति की सबसे बड़ी नेता बनकर उभरीं.

जिस सामंती व्यवस्था के खिलाफ लड़कर मायावती सत्ता तक पहुंचीं,वह खुद सामंती हो गईं.दरअसल मायावती की कार्यशैली शुरू से ही बेहद केंद्रीकृत रही है. मुख्यमंत्री के रूप में उनके फैसलों में उनकी व्यक्तिगत छाप साफ दिखाई देती थी और पार्टी अध्यक्ष के रूप में भी बसपा में अंतिम निर्णय का अधिकार लंबे समय से उनके हाथ में रहा है. कार्यकर्ताओं और नेताओं के लिए उनका नेतृत्व चुनौती देने या बहस करने की जगह आदेश मानने वाला ज्यादा रहा है. यही शैली कभी उनकी ताकत थी, लेकिन आज जब बसपा अपने  सबसे बुरे दौर से  गुजर रही तो भी उनमें कोई  बदलाव नहीं हुआ है. इसका सबसे ताजा उदाहरण आकाश आनंद हैं.

2023 में मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया था. 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान उन्हें अचानक सभी जिम्मेदारियों से हटा दिया गया. चुनाव के बाद उन्हें फिर राष्ट्रीय समन्वयक बनाया गया और मायावती ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी बताया. इसके बाद जिम्मेदारियां फिर घटाई गईं. सितंबर 2026 में उन्हें एक बार फिर बड़ी संगठनात्मक जिम्मेदारी से दूर कर दिया गया और अब ताजा घटनाक्रम में उन्हें पार्टी से ही निकाल दिया गया है.

यह सिर्फ आकाश आनंद की कहानी नहीं है. यह उस राजनीतिक संस्कृति का आईना है जिसमें उत्तराधिकारी का भविष्य संगठन या कार्यकर्ताओं के भरोसे नहीं, एक व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है. राजशाही में राजा तय करता है कि उसका उत्तराधिकारी कौन होगा. लोकतांत्रिक राजनीति में नेता पैदा होते हैं-कार्यकर्ताओं के बीच काम करके, संघर्ष करके, चुनाव जीतकर, जनता का भरोसा हासिल करके. लेकिन अगर किसी पार्टी में यह मान लिया जाए कि सुप्रीमो जिस व्यक्ति के सिर पर हाथ रख देंगे, वही नेता बन जाएगा, तो फिर पार्टी और राजदरबार में बहुत ज्यादा फर्क नहीं रह जाता.

बसपा का मूल दर्शन व्यक्ति पूजा के बजाय बहुजन समाज की राजनीतिक भागीदारी का था. कांशीराम ने संगठन खड़ा किया, कैडर तैयार किया और दलित-पिछड़े समाज को सत्ता की राजनीति में हिस्सेदारी का सपना दिखाया. मायावती ने उस संगठन को सत्ता तक पहुंचाया. 2007 में बसपा ने उत्तर प्रदेश में अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किया और मायावती की राजनीति अपने शिखर पर थी. लेकिन उसके बाद पार्टी का चुनावी ग्राफ लगातार नीचे जाता गया.

पिछले चुनाव के नतीजे

2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा सिर्फ एक सीट जीत सकी और उसका वोट शेयर करीब 12.9 प्रतिशत रहा. 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी उत्तर प्रदेश में एक भी सीट नहीं जीत सकी और उसका वोट शेयर करीब 9.3 प्रतिशत रह गया. 2007 में यही पार्टी 30 प्रतिशत से अधिक वोट लेकर 206 विधानसभा सीटें जीत चुकी थी.

इस गिरावट का एक कारण यह भी है कि बसपा एक आंदोलन से धीरे-धीरे सुप्रीमो-केंद्रित पार्टी में बदल गई. पार्टी में नए नेतृत्व का उभरना मुश्किल होता गया. पुराने नेताओं का एक बड़ा हिस्सा पार्टी छोड़ता गया या बाहर कर दिया गया. दूसरी ओर दलित समाज के भीतर नई राजनीतिक आकांक्षाएं पैदा हुईं. चंद्रशेखर आजाद जैसे नेता युवा दलितों के बीच अपनी जगह बनाने में सफल हुए हैं.

ऐसे समय में बसपा को सबसे ज्यादा जरूरत नए नेतृत्व, नए विचार और संगठन के भीतर लोकतांत्रिक ऊर्जा की है. लेकिन पार्टी में ऐसा होता नहीं दिख रहा है.पार्टी का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल आज भी यह है कि मायावती के बाद कौन? और इस सवाल का जवाब भी पार्टी के भीतर किसी चुनाव, बहस या संगठनात्मक प्रक्रिया से नहीं निकलता. यह जवाब मायावती के अगले फैसले से निकलता है. ऐसा नहीं है कि यह तानाशाही केवल बीएसपी में ही है. कमोबेश आज की तारीख में भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर हर राजनीतिक दल इस समस्या से ग्रसित है.

कांग्रेस लंबे समय से राहुल गांधी को अपने भविष्य का स्वाभाविक नेता मानती रही है.समाजवादी पार्टी में अखिलेश यादव, आरजेडी में लालू परिवार, शिवसेना  यूबीटी  में  ठाकरे परिवार, कश्मीर  के राजनीतिक  दल, डीएमके  आदि दलों में किसी न किसी एक नेता की चलती है जो भविष्य में अपने  परिवार के किसी सदस्य  को अपना   उत्तराधिकारी घोषित करता है. लोकतंत्र के लिए यह परंपरा अभिशाप की तरह है.  

लोकतंत्र में किसी नेता का सबसे बड़ा प्रमाण यह नहीं कि उसके बाद कौन उसका उत्तराधिकारी होगा. असली प्रमाण यह है कि उसके बाद भी उसकी बनाई संस्था कितनी मजबूत रहती है.

मायावती ने दलित समाज को यह विश्वास दिया था कि सत्ता किसी जाति या परिवार की बपौती नहीं है. यह संदेश भारतीय लोकतंत्र के लिए ऐतिहासिक था. लेकिन अब बसपा को बचाने के लिए उसी सिद्धांत को पार्टी के भीतर भी लागू करना चाहिए था. कार्यकर्ता सिर्फ आदेश मानने वाला कैडर नहीं हो सकता. उसे निर्णय प्रक्रिया में हिस्सेदार बनाना होगा. नए चेहरों को सिर्फ उत्तराधिकारी घोषित नहीं करना होगा, बल्कि संघर्ष और संगठन के जरिए उन्हें नेता बनने देना होगा.

बीएसपी में अगर पार्टी का भविष्य सिर्फ इस पर निर्भर करता रहा कि मायावती किसके सिर पर हाथ रखती हैं और किससे हाथ खींच लेती हैं, तो बसपा का संकट किसी एक चुनाव से नहीं जाएगा. सामंतवाद के खिलाफ बनी राजनीति की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि वह अपने भीतर कितना लोकतंत्र पैदा करती है. मायावती ने दलितों से कहा था कि सत्ता किसी की जागीर नहीं है. अब इतिहास उनसे यही सवाल पूछ रहा है कि क्या यह बात बसपा पर भी लागू होगी? क्योंकि लोकतंत्र में उत्तराधिकारी पैदा नहीं किए जाते,नेता पैदा किए जाते हैं. और नेता किसी महारानी के हाथ रखने से नहीं, जनता के बीच संघर्ष करने से बनते हैं.

( ये लेखक के निजी विचार हैं)

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