भारत में डेंगू वैक्सीन को मंजूरी और आगे की राह, कब तक शुरू हो सकता है वैक्सीनेशन, किनके लिए जरूरी – Dengue vaccine qdenga approved in india dengue vaccination 2027 Tvisa


भारत में डेंगू वैक्सीन क्यूडेंगा (Qdenga) को मंजूरी मिल चुकी है. लेकिन बड़ा सवाल यही है कि इस वैक्सीन से टीकाकरण कब तक शुरू होगा. वैक्सीन कैसे काम करेगी. किनके लिए जरूरी है. क्या इससे डेंगू हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा. ऐसे तमाम सवालों के बारे में आजतक. इन को स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ डॉ. चंद्रकांत लहरिया ने डिटेल में अपनी राय दी है.

डॉ चंद्रकात कहते हैं कि एक समय था जब मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों में लोगों को सबसे अधिक डर मलेरिया का होता था, तब डेंगू को कम खतरनाक बीमारी माना जाता था. लेकिन पिछले दो दशकों में तस्वीर बदल गई है.अब डेंगू भारत में ही नहीं, दुनिया के कई देशों में तेजी से फैल रहा है.

भारत में मानसून और उसके बाद के महीनों में इस बुखार के काफी मामले सामने आते हैं. इसके कारण कई मरीजों को अस्पताल में भर्ती होना पड़त है. कुछ मामलों में मौत तक भी हो जाती है. सबसे बड़ी चिंता यह है कि डेंगू के इलाज के लिए अभी तक कोई विशेष एंटीवायरल दवा मौजूद नहीं है.ऐसे में डेंगू की वैक्सीन विकसित करना वैज्ञानिकों के लिए हमेशा एक बड़ी चुनौती रहा है. अब तक कई वैक्सीन सामने आईं, लेकिन हर एक के साथ वैज्ञानिक, सुरक्षा या उपयोग से जुड़ी कुछ सीमाएं रहीं. इसी पृष्ठभूमि में भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल (DCGI) द्वारा टाकेडा की डेंगू वैक्सीन क्यूडेंगा (Qdenga) को मंजूरी मिलना एक महत्वपूर्ण कदम है.

डॉ चंद्रतांत कहते हैं कि भारत जैसे देश के लिए यह वैक्सीन  डेंगू से लड़ाई में एक नया हथियार साबित हो सकती है, क्योंकि अब यह बीमारी केवल एक मौसम तक सीमित नहीं रही. यह तेजी से शहरों में फैल रही है, बार-बार लौट रही है. हालांकि, किसी वैक्सीन को नियामकीय मंजूरी मिल जाना और उसका सार्वजनिक स्वास्थ्य में सफल होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं. कोई वैक्सीन प्रभावी हो सकती है, लेकिन अगर उसकी कीमत अधिक हो, सही लोगों तक न पहुंचे या आम लोगों की पहुंच से बाहर हो, तो उसका असर सीमित ही रहेगा. फिलहाल क्यूडेंगा को बाजार में बेचने की मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन यह अगले छह महीने तक उपलब्ध नहीं होगी. इसकी पहली खेप 2027 की शुरुआत में आने की उम्मीद है.

डेंगू मामलों में लगभग एक-तिहाई हिस्सेदारी भारत की

डॉ. चंद्रकांत कहते हैं कि भारत दुनिया में डेंगू का सबसे बड़ा बोझ झेलने वाले देशों में शामिल है. अनुमान है कि दुनिया के कुल डेंगू मामलों में लगभग एक-तिहाई हिस्सेदारी भारत की है. पिछले दो दशकों में यहां डेंगू के मामलों में 11 गुना से अधिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2025 में देश में करीब 1.2 लाख मामले और 131 मौतें दर्ज हुईं. डेंगू वैक्सीन का इतिहास बताता है कि इस क्षेत्र में सावधानी बेहद जरूरी है. फ्रांस की कंपनी सनोफी की वैक्सीन डेंगवैक्सिया (Dengvaxia) को शुरुआत में बड़ी उपलब्धि माना गया था, लेकिन बाद में पता चला कि जिन लोगों को पहले कभी डेंगू नहीं हुआ था, उनमें वैक्सीन लगने के बाद भविष्य में संक्रमण होने पर गंभीर डेंगू का खतरा बढ़ सकता है. इस स्थिति को एंटीबॉडी डिपेंडेंट एन्हांसमेंट कहा जाता है. इसके कारण वैक्सीन लगाने से पहले यह जांच जरूरी हो गई कि व्यक्ति को पहले डेंगू हुआ है या नहीं. इससे इसका बड़े स्तर पर उपयोग कठिन हो गया.

फिलीपींस में हुए विवाद ने लोगों का भरोसा भी प्रभावित किया. इस पूरे अनुभव से यह सीख मिली कि डेंगू की वैक्सीन को खारिज करने की जरूरत नहीं है, बल्कि यह समझने की जरूरत है कि डेंगू का वायरस और उससे जुड़ी प्रतिरक्षा प्रणाली बेहद जटिल है. इसलिए वैज्ञानिक प्रमाणों से पहले उत्साह नहीं दिखाना चाहिए.

क्यूडेंगा वैक्सीन अन्य वैक्सीन से अलग और बेहतर

डॉ चंद्रकांत कहते हैं कि क्यूडेंगा वैक्सीन इस मामले में अलग है. यह चारों प्रकार के डेंगू वायरस से सुरक्षा देने वाली जीवित लेकिन कमजोर किए गए वायरस पर आधारित वैक्सीन है. इसका आधार कमजोर किया गया DENV-2 वायरस है, जिसमें बाकी तीन प्रकार के डेंगू वायरस की आनुवंशिक सामग्री भी जोड़ी गई है. भारत में इसे 4 से 60 वर्ष की आयु के लोगों के लिए मंजूरी दी गई है. यह दो खुराक में दी जाती है और दोनों डोज के बीच तीन महीने का अंतर रखा जाता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे लगाने से पहले यह जांच जरूरी नहीं है कि व्यक्ति को पहले डेंगू हुआ है या नहीं.

क्लीनिकल परीक्षणों में इस वैक्सीन ने उत्साहजनक परिणाम दिए हैं. एक वर्ष बाद तक यह पुष्टि किए गए डेंगू संक्रमण के खिलाफ लगभग 80 प्रतिशत प्रभावी रही. कुछ विश्लेषणों में अस्पताल में भर्ती होने के जोखिम को कम करने में इसकी प्रभावशीलता 90 प्रतिशत से अधिक रही. करीब साढ़े चार साल बाद भी अस्पताल में भर्ती होने से बचाने में इसकी प्रभावशीलता लगभग 84 प्रतिशत और कुल डेंगू संक्रमण से सुरक्षा करीब 61 प्रतिशत बनी रही. ये आंकड़े निश्चित रूप से उम्मीद जगाते हैं, लेकिन इन्हें संतुलित नजरिए से समझना जरूरी है.

डॉ चंद्रकांत कहते हैं कि यह वैक्सीन संक्रमण को पूरी तरह रोकने की तुलना में गंभीर बीमारी और अस्पताल में भर्ती होने से अधिक प्रभावी सुरक्षा देती है, जो अपने आप में बड़ी उपलब्धि है. भारत में इसके इस्तेमाल के बाद लगातार निगरानी, पारदर्शी रिपोर्टिंग और अलग-अलग राज्यों, आयु वर्गों तथा वायरस के विभिन्न प्रकारों पर स्थानीय अध्ययन करना बेहद जरूरी होगा. 

क्यूडेंगा वैक्सीन को 40 से अधिक देशों में मंजूरी 

क्यूडेंगा को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से प्री-क्वालिफिकेशन मिल चुका है और इसे 40 से अधिक देशों में मंजूरी भी प्राप्त है. टाकेडा ने हैदराबाद की कंपनी बायोलॉजिकल ई (Biological E) के साथ मिलकर भारत में इसका उत्पादन करने की योजना बनाई है. इससे हर साल करीब पांच करोड़ डोज तैयार किए जा सकेंगे और 2030 तक वैश्विक उत्पादन 10 करोड़ डोज सालाना तक पहुंचाने का लक्ष्य है. इससे भारत डेंगू वैक्सीन निर्माण का एक बड़ा केंद्र बन सकता है.

भारत को यह भी तय करना होगा कि इस वैक्सीन का इस्तेमाल कैसे करना है. पूरे देश में एक साथ सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम शुरू करना न तो आर्थिक रूप से आसान होगा और न ही वैज्ञानिक दृष्टि से आवश्यक. डेंगू का खतरा पूरे देश में समान नहीं है. यह कुछ खास शहरों, जिलों और राज्यों में अधिक केंद्रित है. इसलिए बेहतर होगा कि पहले उन क्षेत्रों में चरणबद्ध तरीके से वैक्सीन शुरू की जाए जहां संक्रमण का बोझ सबसे अधिक है.

सरकार को जोखिम वाले समूहों के लिए सार्वजनिक खरीद, सरकारी और निजी क्षेत्र के लिए अलग-अलग मूल्य निर्धारण तथा घरेलू उत्पादन के जरिए सस्ती उपलब्धता सुनिश्चित करने पर विचार करना चाहिए. वैक्सीनेशन के साथ-साथ निगरानी व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा. जिला स्तर पर सटीक आंकड़े जुटाने, निजी अस्पतालों और प्रयोगशालाओं से पूरी रिपोर्टिंग सुनिश्चित करने और यह पता लगाने की जरूरत है कि किस क्षेत्र में डेंगू वायरस का कौन-सा प्रकार अधिक फैल रहा है. ऐसे वैज्ञानिक आंकड़ों के बिना वैक्सीनेशन कार्यक्रम प्रभावी नहीं हो सकेगा. सीमित वैक्सीन को सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में प्राथमिकता देना पूरे देश में समान रूप से बांटने की तुलना में कहीं अधिक लाभकारी होगा.

मच्छरों से बचने के नियमों का पालन जरूरी

यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वैक्सीन आने का मतलब मच्छरों पर नियंत्रण की जरूरत खत्म होना नहीं है. डेंगू से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका अब भी यही है कि मच्छरों के पनपने की जगहों को खत्म किया जाए. घरों और आसपास पानी जमा न होने दिया जाए, जल निकासी व्यवस्था बेहतर बनाई जाए, जरूरत पड़ने पर लार्वीसाइड का उपयोग किया जाए और वैज्ञानिक आधार पर फॉगिंग कराई जाए. लोगों को भी मच्छरों से बचने के लिए रिपेलेंट, मच्छरदानी, जाली और पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़ों का इस्तेमाल जारी रखना चाहिए, साथ ही, समय पर जांच, पर्याप्त पानी पीना और सही इलाज गंभीर डेंगू से होने वाली कई मौतों को रोक सकता है.

व्यक्तिगत स्तर पर भी लोगों की जिम्मेदारी कम नहीं होती है. 4 से 60 वर्ष की आयु के लोग जब यह वैक्सीन उपलब्ध हो जाए, उसकी कीमत और अन्य जरूरी जानकारी स्पष्ट हो जाए, तब योग्य डॉक्टर से सलाह लेकर टीका लगवाने पर विचार कर सकते हैं. जो लोग निजी तौर पर वैक्सीन लेने में सक्षम हैं, उन्हें राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम शुरू होने का इंतजार जरूरी नहीं है, लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि वैक्सीन सुरक्षा की केवल एक अतिरिक्त परत है. इसका मतलब यह नहीं कि घर की पानी की टंकी, कूलर, गमले या नालियों में जमा पानी को नजरअंदाज कर दिया जाए.

अब उत्तर भारत में डेंगू का मौसम शुरू हो चुका है. ऐसे समय में क्यूडेंगा निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह कितनी किफायती बनती है, किस तरह लागू होती है, किन लोगों तक पहुंचती है और इसकी निगरानी कितनी मजबूत होती है.भारत को डेंगू के खिलाफ लड़ाई में एक नया और प्रभावी हथियार जरूर मिला है। लेकिन यह हथियार करोड़ों लोगों की वास्तविक सुरक्षा बन पाएगा या नहीं, इसका फैसला मंजूरी मिलने से नहीं, बल्कि उसके बाद उठाए जाने वाले कदम करेंगे.

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