डाबर इंडिया को ‘100%’ प्योर जैसे दावों को लेकर नोटिस, क्या प्योरिटी के लिए होता है कोई मेडिकल टेस्ट, ऐसे दावे कितने सही, FSSAI अधिकारी ने बताया – FSSAI issues notice to dabur what experts says on 100 % Pure claim Tvisa


आजकल आप दुकान या ग्रोसरी स्टोर पर कोई सामान खरीदने जाते हैं तो कई बार ऐसा होता होगा है कि खाने का कोई पैकेट आपने सिर्फ इसलिए खरीद लिया होगा क्योंकि उस पर बड़े अक्षरों में लिखा 100% प्योर, ‘100% नेचुरल’, लिखा था. ऐसे शब्द मन में भरोसा पैदा करते हैं कि यह सब लिखा है तो सच ही होगा. उसपर आप अगर FSSAI की मुहर देख लेते होंगे तो फिर पैकेट खरीद ही लेते होंगे कि मुहर लगी है तो 100 Pure वाली बात ठीक ही होगी, लेकिन हाल ही में FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India) ने डाबर इंडिया को शहद, घी और तेल समेत कुछ फूड प्रोडक्ट पर ‘100%’ जैसे दावों को लेकर नोटिस भेजा है.

 इसके बाद यह सवाल फिर चर्चा में है कि आखिर किसी भी खाने की चीज पर लिखे ऐसे दावे कितने सच होते हैं? क्या इन दावों की सच्चाई के लिए कोई मेडिकल टेस्ट होते हैं? और अगर किसी पैकेट पर FSSAI का लाइसेंस नंबर है, तो क्या इसका मतलब उस पर लिखा हर दावा भी बिलकुल सही है? आजतक.in ने इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए FSSAI के एक वरिष्ठ अधिकारी और सफदरजंग अस्पताल में मेडिसिन विभाग में डायरेक्टर प्रोफेसर डॉ. जुगल  से बात की है.

 FSSAI क्या करता है? 

FSSAI के वरिष्ठ अधिकारी ने इस बारे में आजतक.इन से फोन पर हुई बातचीत में बताया है. वह कहते हैं कि किसी भी फूड प्रोडक्ट पर FSSAI की मुहर लगने का मतलब है कि वह कंपनी अपने प्रोडक्ट को बाजार में बेच सकती है और उसको सीमित मात्रा में खाना लोगों की सेहत के लिए हानिकारक नहीं है, लेकिन लाइसेंस मिलने का ये मतलब नहीं है कि कंपनी अपने फूड प्रोडक्ट को लेकर कुछ भी ऐसा दावा कर सकती है, जो मेडिकल साइंस या फिर FSSAI के नियमों के खिलाफ है

अधिकारी के मुताबिक, जब कोई कंपनी शहद, घी, तेल, दूध, बिस्किट या कोई भी पैकेज्ड फूड बाजार में बेचने की अनुमति मांगती है, तो FSSAI यह देखता है कि किसी भी प्रोडक्ट की बिक्री से पहले उसके बनने का प्रोसेस क्या है, साफ-सफाई का कितना ध्यान रखा गया है, कच्चे माल की क्वालिटी कैसी है. फूड प्रोडक्ट की माइक्रोबायोलॉजिकल जांच हुई है या नहीं और दूसरे कई पैरामीटर भी देखे जाते हैं.अगर कोई प्रोडक्ट इन सभी पैरामीटर पर खरा उतरता है, तभी उसे बाजार में बेचने की अनुमति मिलती है.तब ही FSSAI की मुहर भी लगती है, लेकिन FSSAI यह नहीं देखता कि कंपनी का विज्ञापन कितना आकर्षक है या वह पैकेट पर क्या लिखेगा और अपने फूड प्रोडक्ट को लेकर क्या दावा भविष्य में कर सकता है. इसी फर्क को अकसर आम लोग मझ नहीं पाते हैं. 

अधिकारी कहते हैं कि FSSAI का लाइसेंस इस बात का प्रूफ है कि प्रोडक्ट क्वालिटी के सभी पैरामीटर पूरा करता है, लेकिन यह इस बात का प्रूफ नहीं है कि पैकेट पर लिखा हर दावा वैज्ञानिक रूप से मेडिकल साइंस में सही साबित हो चुका है. ऐसे में कोई कंपनी ‘100% नेचुरल’, और 100 % प्योर जैसे दावे नहीं कर सकती है,

तो फिर ‘100% प्योर क्यों लिख देते हैं 

FSSAI अधिकारी बताते हैं कि ‘100% प्योर जैसे शब्द सिर्फ आकर्षक लाइनें हैं. ये ऐसे दावे हैं, जिनका असर सीधे ग्राहक के फैसले पर पड़ता है. इनके कारण ही लोग ना चाहते हुए भी कई चीजें खरीद लेते हैं. कानून कहता है कि कोई भी कंपनी ऐसा दावा नहीं कर सकती जो लोगों में गलत संदेश दे. लेकिन बिक्री बढ़ाने के लिए कंपनी अपने प्रोडक्ट पर 100 % प्योर जैसे शब्द लिख देती है. इसी वजह से एक्शन लिया जाता है.

अधिकारी के मुताबिक, किसी भी कंपनी पर एक्शन लेने के लिए  FSSAI एक कानून का पालन करता है. इसको Food Safety and Standards Act, 2006 कहते हैं. इसके तहत ही प्रोडक्ट को लेकर जवाब मांगा जाता है. जरूरत पड़ने पर नोटिस जारी किया जाता है, जांच होती है और नियमों के उल्लंघन करने वालों पर भी कार्रवाई भी की जा सकती है. 
अधिकारी ने बताया कि डाबर को जो नोटिस भेजा गया है वह नियमों के उल्लंघन को लेकर भेजा गया है, उन्होंने शहद और घी को 100 फीसदी प्योर बताया है, लेकिन सही में ऐसा होता नहीं है. ये लोगों को गुमराह करने वाली लाइन है.

क्या फूड प्रोडक्ट के लिए कोई मेडिकल टेस्ट होता है?

इस सवाल पर सफदरजंग अस्पताल में मेडिसिन विभाग में डायरेक्टर प्रोफेसर डॉ. जुगल किशोर ने बताया है. वह कहते हैं कि खानपान के कई प्रोडक्ट का लैब में टेस्ट होता ही है, लेकिन यहां आपको फूड टेस्ट और मेडिकल टेस्ट का फर्क समझना होगा.

जब कोई कंपनी शहद, घी या तेल का लैब टेस्ट कराती है तो उसका मकसद यह जानना होता है कि प्रोडक्ट खाने के लिए सुरक्षित है या नहीं, उसमें कोई खतरनाक बैक्टीरिया तो नहीं है. किसी तरह के केमिकल को तो नहीं डाला गया है. अगर डाला है को उसकी मात्रा क्या है. अगर यह सब चीजें ठीक हैं तो प्रोडक्ट मार्केट में बिक्री के लिए जा सकता है. लेकिन यह टेस्ट ये साबित नहीं करते हैं कि वह प्रोडक्ट 100 प्योर है. 

डॉ किशोर कहते हैं कि  ऐसा नहीं है कि शहद को सीधे मधुमक्खियों के छत्ते से तोड़ा और पैकेट या बोटल में भर दिया. उसको कई तरह से प्रोसेस किया जाता है. कुछ प्रिजरवेटिव डालते हैं. पूरा प्रक्रिया के बाद वह तैयार होता है. इसके बाद फूड टेस्ट किया जाता है, जिसमें देखा जाता है कि फूड में कोई मिलावट तो नहीं हैं और लोगों के खाने के लिए सुरक्षित है या नहीं, लेकिन फूड टेस्ट यह साबित नहीं करता कि वह प्रोडक्ट 100 फीसदी प्योर या नेचुरल है. इसलिए किसी पैकेट पर लिखा हर क्लेम क्लालिटी टेस्ट के हिसाब से तो सही है, लेकिन मेडिकल टेस्ट और मेडिकल साइंस के हिसाब से ऐसा नहीं होता है. यही कारण है कि FSSAI ऐसे दावों को करने वालों को गंभीरता से देखता है और जरूरत पड़ने पर कंपनियों से उसका वैज्ञानिक आधार मांगता है.

तो आम लोगों को अब क्या करना चाहिए 

इस बारे में डॉ किशोर कहते हैं कि किसी भी पैकेज्ड फूड को सिर्फ सामने लिखी बड़ी-बड़ी लाइनों के आधार पर न खरीदें. पैकेट पलटकर  इंग्रीएंटस लिस्ट पढ़ें और FSSAI License Number जरूर देखें. आप कोई भी प्रोडक्ट उसके लिखे दावों विज्ञापन में बताए दावों के आधार पर बिलकुल न खरीदें. 
 

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