लाल चींटी की पारंपरिक चटनी…प्रोटीन से होती है भरपूर, बस्तर के लोग खाते हैं बड़े चाव से – bastar red ant chaprah chutney health benefits sustainable superfood laal cheeni ki chutney tvism


Bastar chaprah chutney: भारत के अलग-अलग हिस्सों में खान-पान की कई ऐसी अनोखी चीजें मिलती हैं जो पहली नजर में हैरान करती हैं लेकिन सेहत के मामले में फायदेमंद मानी जाती हैं. ऐसा ही एक अनोखा फूड छत्तीसगढ़ के बस्तर रीजन में काफी पॉपुलर है जिसे चापड़ा चटनी (Chapra Chutney) कहा जाता है. यह चटनी किसी फल या सब्जी से नहीं बल्कि पेड़ों पर रहने वाली लाल चींटियों और उनके अंडों से तैयार की जाती है. बस्तर के आदिवासी समाज में इस चटनी को सदियों से बेहद चाव के साथ खाया जा रहा है. आज के समय में जब पूरी दुनिया न्यूट्रिशन के नए ऑपशंस तलाश रही है, तब बस्तर की यह पारंपरिक लाल चींटी की चटनी एक बेहतरीन सुपरफूड मानी जाती है.

बस्तर की चापड़ा चटनी और इसके फायदे

बस्तर के स्थानीय लोग जंगलों में साल और महुआ के ऊंचे पेड़ों से इन लाल बुनकर चींटियों (Red Weaver Ants) के घोंसलों को इकट्ठा करते हैं. इन चींटियों को पीसकर नमक, अदरक, लहसुन और हरी मिर्च के साथ मिलाकर एक तीखी और खट्टी चटनी तैयार की जाती है. चींटियों के डंक में मौजूद फॉर्मिक एसिड की वजह से इस चटनी का स्वाद काफी चटपटा और खट्टा होता है.

न्यूट्रिशन रिपोर्ट के अनुसार, लाल बुनकर चींटियों से बनी यह चटनी प्रोटीन, कैल्शियम, जिंक, आयरन, विटामिन B-12, पोटैशियम और मैग्नीशियम जैसे जरूरी न्यूट्रिएंट्स से भरपूर होती है. इसे खाने से न सिर्फ शरीर की इम्यूनिटी मजबूत होती है, बल्कि यह नर्वस सिस्टम को बेहतर रखने और दिमागी थकान व डिप्रेशन जैसी दिक्कतों को दूर करने में भी काफी मददगार मानी जाती है.

क्यों माना जा रहा है इसे ग्लोबल सुपरफूड?

आजकल पर्यावरण और सस्टेनेबल डाइट को लेकर दुनिया भर में बड़ी चर्चाएं हो रही हैं. ऐसे में कीड़े-मकोड़ों को प्रोटीन के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है. इस ट्रेडिशनल फूड को अब भारत ही नहीं बल्कि इंटरनेशनल लेवल पर भी काफी अटेंशन मिल रहा है.

एशिया न्यूज नेटवर्क की साइंटिफिक रिपोर्ट में एक्सपर्ट्स ने दावा किया है कि यह लाल चींटी की चटनी वास्तव में एक बेहतरीन सस्टेनेबल सुपरफूड है. पारंपरिक मीट प्रोडक्शन की तुलना में इन कीड़ों से प्रोटीन हासिल करना पर्यावरण के लिए बहुत कम नुकसानदायक होता है क्योंकि इसमें ग्रीनहाउस गैसों का एमिशन बेहद कम होता है. बस्तर और ओडिशा के ट्राइबल इलाकों का यह पारंपरिक फूड अब देश-विदेश के फूड लवर्स और वैज्ञानिकों के बीच अपनी खास पहचान बना चुका है.

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