प्रयागराज महाकुंभ से चर्चा में आए मौनी बाबा का निधन, प्रतापगढ़ के चिलबिला में दी गई भू-समाधि – pratapgarh mouni baba dinesh swaroop brahmachari death 44 years silent vow competitive exam guidance


संत दिनेश स्वरूप ब्रह्मचारी पायाहरी उर्फ मौनी बाबा का निधन हो गया है. मौनी बाबा ने बुधवार को प्रतापगढ़ के चिलबिला में अंतिम सांस ली. वह करीब 44 साल से मौन व्रत धारण किए हुए थे. मूल रूप से उत्तर प्रदेश के ही महोबा जिले के निवासी मौनी बाबा ने लंबे समय तक चित्रकूट में साधना की और उसके बाद प्रतापगढ़ चले आए थे जहां वह चिलबिला इलाके में रहते थे.

मौनी बाबा साल 2025 में प्रयागराज में लगे महाकुंभ से चर्चा में आए थे. वह अपनी अनोखी साधना के साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने और परीक्षार्थियों को दिशा निर्देश देने को लेकर चर्चा में आए थे. करीब 44 साल से मौन संत दिनेश स्वरूप ब्रह्मचारी कागज-कलम के जरिये लिखकर संवाद करते थे. यही वजह है कि श्रद्धालुओं के बीच उनकी पहचान ‘मौनी बाबा’ के रूप में बन गई.

साधना के समय अन्न-जल का त्याग कर लंबे समय तक केवल चाय के सहारे रहने के कारण भी मौनी बाबा चर्चा में रहे हैं. महाकुंभ 2025 के समय प्रयागराज में उनके शिविर में श्रद्धालुओं के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले परीक्षार्थियों की भी भीड़ जुटती थी. यूपीएससी, पीसीएस समेत कई प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी किस तरह से तैयारी करें, उनसे इसकी जानकारी लेने के लिए पहुंचते थे.

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कई परीक्षार्थी मौनी बाबा के बताए तरीके से तैयारी कर प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल भी हुए. मौन व्रत धारण करने वाले मौनी बाबा सवालों के जवाब कागज पर लिखकर देते थे. इसके अलावा उन्होंने एनसीईआरटी की पुस्तकों को प्रश्न-उत्तर के रूप में तैयार कर अभ्यर्थियों के लिए नोट्स भी तैयार करवाए थे. छात्रों का कहना था कि उनके बनाए नोट्स से तब सब्जेक्ट को समझना आसान हो जाता था.

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प्रतापगढ़ के चिलबिला में स्थानीय लोगों और भक्तों से भी उनका गहरा जुड़ाव हो गया था. उनके निधन की खबर मिलते ही भक्त और अनुयायी उनके अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पड़े. लोगों ने कहा कि बाबा की पहचान केवल एक साधक के रूप में नहीं, बल्कि युवाओं को शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए प्रेरित करने वाले मार्गदर्शक के रूप में भी बनी थ. चिलबिला के आश्रम में ही उनके पार्थिव शरीर को भूमि समाधि दी गई है.

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