फ्रांस में दो ऐसे कीटनाशकों को दोबारा मंजूरी मिली, जिन्हें मधुमक्खियों के लिए खतरनाक माना जाता है. फैसले के विरोध में पर्यावरण मंत्री मोनिक बारबट ने इस्तीफा दे दिया. उनका कहना था कि जब पर्यावरण और जैव विविधता से जुड़े बुनियादी सिद्धांतों से समझौता होने लगे, तो पद पर बने रहने का कोई मतलब नहीं रह जाता. अब सवाल भारत को लेकर उठ रहा है. यहां भी कुछ ऐसे कीटनाशकों को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है, जिन्हें कई विशेषज्ञ मधुमक्खियों, केंचुओं और मिट्टी के लिए नुकसानदेह बताते हैं. ऐसे में सवाल यह है कि फ्रांस में एक नीति पर मंत्री पद छोड़ देती हैं, जबकि भारत में इन्हीं मुद्दों पर सरकारी सोच अलग क्यों दिखती है?
फ्रांस की संसद ने हाल ही में एसीटामिप्रिड (Acetamiprid) और फ्लूपाइराडिफ्यूरोन (Flupyradifurone) के इस्तेमाल की अनुमति देने वाला कानून पास किया. इन रसायनों को लेकर पहले से पर्यावरण संबंधी चिंताएं जताई जाती रही हैं, खासकर मधुमक्खियों पर इनके असर को लेकर. इसी फैसले के बाद मोनिक बारबट ने इस्तीफा देते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि पिछले नौ महीनों में उन्होंने जंगलों, पानी, हवा, मिट्टी और जैव विविधता की रक्षा के लिए काम किया, लेकिन अब उनके पास उस दिशा में आगे बढ़ने के साधन नहीं बचे हैं.
बारबट का इस्तीफा सिर्फ एक मंत्री के पद छोड़ने की खबर नहीं रहा. फ्रांस में इसे पर्यावरण बनाम कृषि नीति की बहस के तौर पर देखा जा रहा है. एक तरफ किसानों की जरूरतों का तर्क है, दूसरी तरफ जैव विविधता को बचाने की चिंता.
भारत में 2020 से 2023 के बीच क्या बदला?
जब हम भारत की स्थिति पर नजर डालते हैं, तो नीतिगत फैसलों में बड़ा विरोधाभास दिखता है. साल 2020 में कृषि मंत्रालय ने 27 घातक कीटनाशकों को बैन करने का एक शुरुआती ड्राफ्ट तैयार किया था. तब उम्मीद जगी थी कि सरकार नागरिकों की सेहत और पर्यावरण को लेकर सख्त कदम उठाएगी.
हालांकि, साल 2023 में जब अंतिम आदेश जारी हुआ, तो कहानी पूरी तरह बदल गई. व्यावसायिक लॉबी के दबाव के आगे नीति-निर्माताओं का रुख नरम पड़ गया. नतीजा यह हुआ कि 27 में से 24 घातक रसायनों को खेती में इस्तेमाल करने की दोबारा छूट दे दी गई. जो केमिकल दुनिया भर में प्रतिबंधित हो रहे थे, उन्हें भारतीय खेतों में खुलेआम इस्तेमाल करने की इजाजत मिल गई.
केंचुए भी हैं इस बहस का हिस्सा
इन रासायनिक कीटनाशकों की मार सिर्फ उड़ने वाले जीवों तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन के भीतर दिन-रात काम करने वाले केंचुओं पर भी पड़ रही है. केंचुए मिट्टी को खाकर उलट-पुलट करते हैं, जिससे जमीन में ऑक्सीजन पहुंचती है और वह उपजाऊ बनती है. जब खेतों में क्लोरोपायरीफॉस और कार्बोफ्यूरान जैसे रसायनों का छिड़काव होता है, तो ये पानी के साथ घुलकर मिट्टी के भीतर बैठ जाते हैं. यह जहर केंचुओं की नाजुक त्वचा के जरिए उनके शरीर में समा जाता है. इससे उनका नर्वस सिस्टम ठप हो जाता है और वे मिट्टी के अंदर ही दम तोड़ देते हैं. जिस मिट्टी में लाखों केंचुए होने चाहिए थे, वे खेत अब बेजान और खोखले होते जा रहे हैं.
मधुमक्खियां क्यों हैं इतनी अहम?
अक्सर हमें लगता है कि फसल सिर्फ किसान उगाता है, लेकिन सच यह है कि बिना मधुमक्खियों के परागण के फल या दाना बनना मुमकिन नहीं है. भारत की प्रमुख फसलें जैसे सरसों, सूरजमुखी, सेब, आम, दालें और कपास पूरी तरह मधुमक्खियों पर निर्भर हैं. वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, मधुमक्खियों की मौजूदगी से सरसों की पैदावार में 25% से 40% तक की सीधी बढ़ोतरी होती है.
ऐसफेट, क्लोरोपायरीफॉस, मैलाथियान और डाइमेथोएट जैसे केमिकल इन मासूम जीवों के लिए काल बन रहे हैं. कुछ केमिकल मधुमक्खियों के दिमाग को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे वे सूर्य की दिशा देखकर अपने छत्ते पर लौटने का रास्ता भूल जाती हैं. वहीं कुछ रसायन उनके उड़ने की क्षमता खत्म कर देते हैं या उनके श्वसन तंत्र को बंद कर देते हैं.
दुनिया के बड़े वैज्ञानिकों ने हमेशा आगाह किया है कि मधुमक्खियों के बिना इंसान का वजूद खतरे में पड़ जाएगा. अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि अगर धरती से मधुमक्खियां गायब हो गईं, तो इंसानों के पास जीने के लिए बहुत कम समय बचेगा. बिना परागण के पौधे नहीं होंगे, पौधे नहीं होंगे तो अनाज और जीव-जंतु नहीं बचेंगे. डेविड एटनबरो ने भी चेताया था कि इनके बिना पूरी खाद्य श्रृंखला ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी.
अगर भारत में इसी तरह घातक रसायनों को छूट मिलती रही, तो आने वाले समय में गंभीर खाद्य संकट खड़ा होना तय है. नीति-निर्माताओं को यह समझना होगा कि तात्कालिक व्यावसायिक फायदों के लिए मिट्टी और पर्यावरण का सौदा करना भविष्य की पीढ़ियों को भुखमरी की ओर धकेलने जैसा है.
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